संग्रहणी रोग का सफल आयुर्वेदिक उपचार / Ayurvedic Treatment For Irritable Bowel Syndrome And Acid Peptic Disorder

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संग्रहणी रोग (Irritable Bowel Syndrome):

आज हम पेट की एक बहुत ही आम बीमारी ‘संग्रहणी रोग’के आयुर्वेदिक उपचार के बारे में बात करेंगे. आधुनिक मेडिकल साइंस (Modern Medical Science) में इसे इर्रिटेबल बाउअल सिंड्रोम (Irritable Bowel Syndrome) और एसिड पेप्टिक डिसऑर्डर (Acid Peptic Disorder) की मिली जुली कंडीशन माना जाता है   यह बीमारी बहुत ही आम है क्योंकि हर दूसरा-तीसरा आदमी इस बीमारी से पीड़ित मिल जाएगा.

इस बीमारी को आम ज़बान में ‘पेट खराब है’ कहकर काम चला लिया जाता है, लेकिन आयुर्वेद में इसके बारे में न सिर्फ विस्तार से बताया गया है बल्कि इसका सफल देसी आयुर्वेदिक इलाज भी सुझाया गया है. इस बीमारी को आयुर्वेद में ‘संग्रहणी’ नाम से जाना जाता है.

आज हम संग्रहणी रोग के लक्षण, कारण और आयुर्वेदिक इलाज पर चर्चा करेंगे.
दोस्तों क्या है यह संग्रहणी रोग, आओ जानें.

संग्रहणी रोग (Sangrihni Roga or Irritable Bowel Syndrome):
आपको बहुत से लोग कहते हुए मिल जायेंगे कि कुछ भी खाते हैं , हज़म ही नहीं होता, खाया पिया नहीं लगता, खाना खाते ही मलत्याग की इच्छा होने लगती है. हाँ दोस्तों सही समझे यही संग्रहणी रोग का आरंभिक रूप है. आमतौर पर इसे पेट खराब है, आँतें खराब है वगैरा कहकर टाल दिया जाता है. मैं आपको बता दूँ कि जितना मामूली इस रोग को समझा जाता है, हकीकत में यह रोग उतना ही खतरनाक है. इस रोग में शरीर का कभी विकास नहीं हो पता है और पीड़ित व्यक्ति बेहद दुबला दिखाई देता है.
तो मूलभूत रूप से संग्रहणी एक उदर रोग है यानि पाचन तंत्र (Digestive system) की बीमारी है.

आधुनिक मेडिकल साइंस के हिसाब से संग्रहणी रोग लक्षणों (symptoms)  का एक समूह है. ये लक्षण पेट में अलग अलग कारणों से पैदा होते हैं और फिर सामूहिक रूप से( collectively) संग्रहणी रोग पैदा करते हैं.

संग्रहणी रोग के लक्षण (Symptoms):
यूँ तो संग्रहणी रोग के भी कई टाइप होते हैं और लक्षण भी बहुत सारे होते हैं परन्तु सभी लोगों में सभी लक्षण नहीं पैदा होते हैं. पर कुछ लक्षण संग्रहणी रोग से पीड़ित हर आदमी में मिलते हैं जिन्हे हम संग्रहणी के क्लासिकल सिम्पटम्स (classical symptoms) कहते हैं:

1. मल  कभी पतला तो कभी ठोस होता है, आयुर्वेद में इसे सार रूप में ‘मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम’ कहा गया है.
2. कभी कब्ज़ (constipation) हो जाता है तो कभी दस्त (diarrhea) आने लगते हैं.
3. खाना खाने के तुरंत बाद मलत्याग की इच्छा का होना
4. पेट में हल्का-हल्का दर्द रहना
5. शरीर दुबला रहता है और हर समय लेटे रहने की इच्छा रहती है.

संग्रहणी रोग के कारण (Causes):
संग्रहणी रोग मुख्य रूप से निम्न कारणों से होता है :
1. हमारे पेट में एचसीएल (HCl) एसिड निकलता है, यह एसिड खाने (food) को हज़म (digest) करने में मदद करता है. एचसीएल सिर्फ तभी निकलता है जब हम खाना खाते हैं.कई बार खानपान की गलत आदतें जैसे खाने का कोई निश्चित समय न होना, खाने में मिर्च-मसाले और जंक फ़ूड (बर्गर, चाउमीन आदि) का ज़्यादा इस्तेमाल, खाने और एचसीएल के निकलने के बीच का तालमेल गड़बड़ा देता है और एचसीएल बिना खाये खाली पेट भी निकलने लगता है या खाने के बाद भी नहीं निकलता है. इससे बदहज़मी (dyspepsia) शरू हो जाती है. खाना ढंग से पच नहीं पाता है. खाना देर तक पेट में पड़ा रहता है जिसकी परिणति आख़िरकार संग्रहणी रोग के रूप में होती है.
2. पेट (stomach) से लेकर हमारी आँत (intestine)  के आखरी सिरे तक हमेशा गति होती रहती है जिससे खाना आगे बढ़ता रहता है. कई बार इस गति की लय (rhythm) बिगड़ जाती है जिसकी वजह से कभी आँत तेज़ी से खाने को आगे बढ़ाती है तो कभी बहुत देर तक गति धीमी पड़ी रहती है और खाना आगे नहीं बढ़ता है. ऐसा खानपान की गलत आदतों और अधिक तनाव (stress) और टेंशन लेने से होता है.
3. आँत में पहुँचते पहुँचते भोजन अपने अवयवों (ingredients) यानी एमिनो एसिड्स (amino acids), मोनोस्केराइड्स (monosaccharides) वगैरा में टूट जाता है और फिर ये अवयव आँत से खून में मिल जाते हैं जिससे शरीर का विकास होता है और हमें एनर्जी (energy) मिलती है. भोजन के अवयवों का खून में मिलना absorption and assimilation कहलाता है. संग्रहणी रोग में अब्सॉर्प्शन की यह प्रक्रिया भी ठीक से काम नहीं करती है और भोजन जिससे शरीर का विकास होना था, एनर्जी मिलनी थी ज्यूं का त्यूं मल के रूप में निकल जाता है.
इस तरह से संग्रहणी रोग भोजन को न तो हज़म होने देता है और न ही शरीर का विकास होने देता है. शरीर में कमज़ोरी  बनी रहती है. कुछ भी खा लेते हैं लेकिन सब मल के साथ बाहर निकल जाता है. इसीलिए इसे रोगराज भी कहा गया है.

संग्रहणी रोग से उत्पन्न अन्य बीमारियाँ (Other Complications Of Sangrihni): 

संग्रहणी रोग की वजह से कई अन्य बीमारियाँ भी पैदा हो जाती हैं. रोगी को कभी कब्ज़ रहता है तो कभी दस्त. कब्ज़ की वजह से अक्सर बवासीर (hemorrhoids) हो जाती है. (बवासीर के आयुर्वेदिक उपचार के बारे में यहाँ पढ़ें ). शरीर में दुर्बलता (weakness and lethargy) रहती है. रोगी जल्दी थक जाता है.

संग्रहणी रोग का आयुर्वेदिक उपचार (Ayurvedic and Herbal Treatment):

हमारे शास्त्रों में संग्रहणी रोग को बहुत गम्भीरतापूर्वक लेते हुए इसका यह उपचार बताया गया है.

दही

1. खाने में दही (curd) की उपयुक्त मात्रा. रोगी को दही से कोई परेशानी नहीं है तो एक कटोरी दही सुबह, दोपहर और आधी कटोरी रात में लेनी है. रोगी को ब्लड प्रेशर की शिकायत न हो तो दही में स्वादानुसार थोड़ा सा नमक मिला लेना चाहिए.
2. तक्र यानि मट्ठे का नियमित सेवन. ध्यान रहे की चूँकि मट्ठा प्रकृति से ठंडा होता है इसलिए मट्ठे का सेवन दोपहर में करें.
3. द्राक्षासव
4. लोहासव
5. कुमारीआसव
6. पुनर्नवासव
इन चारों आसवों के पाँच पाँच चम्मच एक गिलास पानी में मिलकर दोनों टाइम भोजन के बाद
7. लवणभास्कर चूर्ण : 3 ग्राम चूर्ण दोनों टाइम खाने के बाद पानी से.

 

इन बातों का भी रखें ध्यान :
1. भोजन का एक निश्चित समय बना लें और भोजन केवल उसी समय करें. भोजन के समय में बिलकुल देर न करें.
2. जंक फ़ूड जैसे बर्गर, चाउमीन, चाट आदि का इस्तेमाल न करें.
3. खाने को कम से कम तेल में बनाएं और मिर्च मसालों का उपयोग भी कम से कम करें.
4. टेंशन/ तनाव संग्रहणी के मुख्य कारण होते हैं, इसलिए कोशिश करें की तनाव आपकी ज़िन्दगी में तनाव न घोल पाए.
5. भोजन में पत्तेदार सब्ज़ियां शामिल करें
6. खुश रहें.

दोस्तों Go Curable भी संग्रहणी रोग का आयुर्वेदिक उपचार उपलब्ध कराता है. हमारे चिकित्सकों से परामर्श या उपचार प्राप्त करने के लिए हमसे कांटेक्ट कीजिये या लिखिए.

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देसी दवाइयों से जड़ से ख़त्म करें बवासीर / Ayurvedic Herbal Treatment For Piles (Hemorrhoids)

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बवासीर (Hemorrhoids, Piles): आयुर्वेदिक समाधान 

बवासीर जिसे इंग्लिश में हेमोर्रोइड्स (Hemorrhoids) या पाइल्स (Piles) कहा जाता है एक बहुत ही पीड़ादायी बीमारी है. यह मलमार्ग के मुख पर उपस्थित खून की नलिकाओं (Veins) के फूल जाने से होती है जिन्हें आम ज़बान में बवासीर के मस्से कहा जाता है.


आज हम बवासीर के बारे में और इसके आयुर्वेदिक देसी इलाज के बारे में आपको बताएँगे.

बवासीर क्या है (What is Piles):
दोस्तों हमारे मलमार्ग के मुख पर छोटी छोटी खून की नलिकाओं का जाल (Hemorrhoidal Plexus)  होता है. ये नलिकाएं मल को बिना इच्छा के बाहर आने से रोकती हैं यानी इनका काम मल को अंदर रोकना होता है. मल तभी बाहर निकलता है जब हम मल त्याग की इच्छा करते हैं. खाने में फाइबर (Fibers) की संख्या कम होने पर यानी बिना रेशे वाला खाना लम्बे टाइम तक खाने से क़ब्ज़ (Constipation) रहने लगता है. कब्ज़ में
१. एक तो मल सूख जाता है अतः मल त्याग के वक़्त जब मल बाहर निकलता है तो घर्षण (Friction)की वजह से मलद्वार पर मौजूद खून की नलिकाएं (ब्लड वेसल्स=blood vessels) छिल जाती हैं.
२. दूसरे कब्ज़ में मल त्याग के लिए ज़ोर लगाना पड़ता है जिसकी वजह से फिर से इन नलिकाओं पर ज़ोर पड़ता है.
इन दो कारणों से ये नलिकाएं फूल जाती हैं और मलत्याग के समय अक्सर ये फट जाती हैं और इनमे से खून निकलने लगता है जिसे बवासीर का रोग कहा जाता है और इन फूली हुई नलिकाओं को बवासीर के मस्से कहा जाता है.

बवासीर के प्रकार (टाइप)

(Types Of Piles):
बवासीर आमतौर पर दो तरह की मानी गयी है:

1. अंदरूनी बवासीर या खूनी बवासीर (Internal Hemorrhoids):
इस टाइप की बवासीर में मस्से मलद्वार के अंदर की तरफ होते हैं. इस बवासीर में मलत्याग के समय मस्सों के छिल जाने से खून निकलने लगता है जोकि या तो मल पर लगा हुआ दिखाई देता है या टॉयलेट सीट पर बून बूँद करके गिरता हुआ दिखाई देता है. आमतौर पर इस तरह की बवसीर के मस्सों में दर्द नहीं होता है.

2. बाहरी बवासीर (External Hemorrhoids):
इस टाइप की बवासीर में मस्से मलद्वार के ठीक बाहर की तरफ होते हैं. आमतौर पर ये मस्से कोई परेशानी पैदा नहीं करते लेकिन अगर इनमे खून रुक जाता है या खून का थक्का बन जाता है तो ये मस्से बहुत दर्द करते हैं.
यहाँ ये जान लेना ज़रूरी है कि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि एक आदमी में एक बार में सिर्फ अंदरूनी या बाहरी मस्से ही होंगे, ऐसा नहीं है. एक आदमी में एक साथ अंदरूनी और बाहरी दोनों मस्से हो सकते हैं.
औरतें बच्चे के जन्म के समय ज़ोर पड़ने की वजह से अक्सर बवासीर से पीड़ित हो जाती हैं.

अंदरूनी और बाहरी बवासीर ( सौजन्य: विकिमीडिआ)

 बवासीर कैसे पहचानें :

(How To Diagnose Hemorrhoids):
वैसे तो मस्से महसूस हो जाते हैं लेकिन एक बार प्रशिक्षित डॉक्टर से चेक-अप करा लेना बेहतर है क्योंकि बवासीर जैसे लक्षण कई अन्य बीमारियों जैसे भगन्दर(फिस्टुला), मलमार्ग का कैंसर वगैरा में भी हो सकते हैं.
बवसीर का आयुर्वेदिक देसी और हर्बल इलाज:
बवासीर का आयुर्वेद में बहुत ही आसान और कारगर इलाज है. बवासीर को आयुर्वेद में अर्श कहा जाता है. सुश्रुत संहिता में बवासीर का इलाज बहुत विस्तार से बताया गया है.

आयुर्वेद में बवासीर के दो प्रकार के इलाज हैं.
1. सर्जरी से.
2. दवाइयों से.
यहां हम सिर्फ देसी दवाइयों से बवासीर का इलाज आपको बताएँगे.
1. तिल का तैल
दिन में पांच बार साफ़ हाथ से हलके हलके मस्सों पर तिल का तेल लगाएं. बाजार में तिल का तैल लगभग 15 जड़ी बूटियों के मेल से बना ‘जात्यादि तैल’ नाम से मिलता है.


2. नारियल के छिलके पर उपस्थित रेशों को जलाकर भस्म बना लें और रोज़ तीन ग्राम दिन में दो बार 3 ग्राम बूरे की साथ छाछ से इसे लें.


3. ज़्यादा से ज़्यादा फाइबर वाला खाना खाएं. दही का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा करें. फल खाएं, खासतौर से संतरा जिसमे फाइबर भी अधिक होते हैं और विटामिन सी घाव भरने में भी मदद करता है.


4. दर्द ज़्यादा होने पर सिट्ज़ बाथ (Sitz Bath) का इस्तेमाल करें. इसमें एक टब में गुनगुना पानी भरकर उसमे आधे घंटे बैठना होता है. यह विधि सिट्ज़ बाथ कहलाती है.


5. दूध में नीम्बू: दूध को गर्म करके ठंडा कर लें. एक कप दूध में एक नीम्बू का रस सुबह खाली पेट पिएं. सात दिन में बवासीर ख़त्म हो जाती है.

इन पर भी ध्यान दें:
1. क़ब्ज़ न होने दें.
2. मलत्याग के समय ज़्यादा ज़ोर न लगाएं और न ही मलत्याग में अधिक समय लगाएं.
3. फाइबर वाला खाना: वह खाना जिसमे रेशा अधिक होता है जैसे फल, बिना छाना आटा, चने का आटा वगैरा.

दोस्तों ऊपर दी गयी जानकारी आपकी जागरूकता कि लिए है. अगर आपके मन में कोई सवाल है या आप इस बारे में और जानना चाहते हैं तो हमें लिखिए या हमसे कांटेक्ट कीजिये. आप बवासीर के आयुर्वेदिक इलाज की किट हमसे भी मँगा सकते हैं.

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